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प्रेम,विश्वासघात और बलिदान का गवाह भूरागढ़ किला : मकर संक्रांति पर सजता है प्रेमियों का मेला, 1857 की क्रांति की गूंज आज भी जीवंत

बांदा | 15-Jan-2026 08:06 PM | 65 |
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मकर संक्रांति पर सजता है प्रेमियों का मेला, 1857 की क्रांति की गूंज आज भी जीवंत

प्रेम, विश्वासघात और बलिदान का गवाह भूरागढ़ किला
मकर संक्रांति पर सजता है प्रेमियों का मेला, 1857 की क्रांति की गूंज आज भी जीवंत


बांदा।केन नदी के तट पर स्थित ऐतिहासिक भूरागढ़ किला केवल पत्थरों से बना एक दुर्ग नहीं, बल्कि प्रेम, विश्वासघात, त्याग और आज़ादी की लड़ाई की जीवंत दास्तां है। मकर संक्रांति के अवसर पर यहां हर वर्ष लगने वाला प्रसिद्ध प्रेमियों का मेला इस किले की उस अधूरी प्रेम गाथा को फिर से जीवित कर देता है, जिसके आगे फिल्मी कहानियां भी फीकी पड़ जाती हैं। साथ ही यह किला 1857 की प्रथम स्वतंत्रता संग्राम की क्रांतिकारी गूंज को आज भी अपने भीतर समेटे हुए है।
लगभग 650 वर्ष पुराना भूरागढ़ किला बुंदेलखंड के इतिहास का एक महत्वपूर्ण अध्याय माना जाता है। लोक मान्यताओं के अनुसार, कई सौ वर्ष पूर्व यहां एक राजा का शासन था। उसकी पुत्री का प्रेम एक नट से हो गया, जो करतब दिखाने के लिए दूर-दूर से आता था। दोनों विवाह करना चाहते थे, लेकिन राजा को यह प्रेम स्वीकार नहीं था। छलपूर्वक राजा ने शर्त रखी कि यदि नट केन नदी से किले तक रस्सी के सहारे चलकर पहुंच जाएगा, तभी वह विवाह के लिए राजी होगा।
नट ने साहस दिखाया और रस्सी पर चल पड़ा। जब वह सफलता के करीब था, तभी राजा ने धोखे से रस्सी कटवा दी। रस्सी टूटते ही नट केन नदी में गिरकर डूब गया। इस हृदयविदारक घटना की स्मृति में वहां एक मंदिर का निर्माण किया गया। मान्यता है कि आज भी यहां सच्चे प्रेम की परीक्षा होती है और सच्चे मन से मांगी गई मन्नत पूरी होती है।
मकर संक्रांति पर भूरागढ़ किला प्रेमियों के मेले में तब्दील हो जाता है।
दूर-दराज़ से आए प्रेमी जोड़े केन नदी में स्नान कर मंदिर में दर्शन करते हैं और अपने रिश्तों की मजबूती व विवाह की कामना करते हैं। इस अवसर पर नटबली मेला, भजन-कीर्तन, सांस्कृतिक कार्यक्रम और विशाल भंडारे का आयोजन होता है, जिससे पूरा क्षेत्र श्रद्धा और उत्सव के रंग में रंग जाता है।
भूरागढ़ किला केवल प्रेम की कहानी तक सीमित नहीं है। यह दुर्ग ब्रिटिश हुकूमत की क्रूरता और 1857 की क्रांति का भी मूक साक्षी रहा है। इतिहासकारों के अनुसार, अंग्रेजी शासन के दौरान यहां सैकड़ों स्वतंत्रता सेनानियों को फांसी दी गई और अनेक क्रांतिकारियों ने अपने प्राणों की आहुति दी। आज भी किले की दीवारें शहीदों की कुर्बानी की गवाही देती हैं। समय-समय पर प्रशासन की देखरेख में श्रद्धांजलि कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं, जिनमें पूर्व सैनिक और स्थानीय नागरिक शहीदों को नमन करते हैं।
मकर संक्रांति पर लगने वाला भूरागढ़ किला मेला प्रेम, आस्था और बलिदान का अनूठा संगम है, जो न केवल लोक विश्वास को सशक्त करता है, बल्कि नई पीढ़ी को अपने गौरवशाली इतिहास और स्वतंत्रता संग्राम की याद भी दिलाता है।

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