दिग्विजय पर 'नागपाश' का वार, लेकिन निधि चतुर्वेदी से भी सवाल? कांग्रेस में पार्टी फोरम से ज्यादा सोशल मीडिया पर क्यों छिड़ती है जंग?"PHM NEWS महेन्द्र कुमार पाल लवकुश नगर जिला छतरपुर मध्य प्...
दिग्विजय पर 'नागपाश' का वार, लेकिन निधि चतुर्वेदी से भी सवाल? कांग्रेस में पार्टी फोरम से ज्यादा सोशल मीडिया पर क्यों छिड़ती है जंग?"
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महेन्द्र कुमार पाल
लवकुश नगर जिला छतरपुर मध्य प्रदेश
मध्य प्रदेश कांग्रेस में अंदरूनी खींचतान एक बार फिर सार्वजनिक हो गई है। इस बार पार्टी की प्रदेश महासचिव निधि सत्यव्रत चतुर्वेदी ने सोशल मीडिया पर लंबी पोस्ट लिखकर वरिष्ठ नेता दिग्विजय सिंह पर तीखा हमला बोला। उन्होंने उज्जैन के वीर भारत न्यास और भूमि विवाद प्रकरण में दिग्विजय सिंह द्वारा प्रदेश अध्यक्ष जीतू पटवारी के खिलाफ सार्वजनिक रूप से की गई टिप्पणियों को अनुशासनहीनता बताते हुए उन पर "पुत्र-मोह" में पार्टी का अनुशासन भूलने, संगठन को कमजोर करने और यहां तक कि "स्लीपर सेल" जैसी भूमिका निभाने तक के गंभीर आरोप लगाए। अपनी पोस्ट का शीर्षक भी उन्होंने रखा— "दिग्विजय का नागपाश"
निधि चतुर्वेदी का तर्क है कि यदि दिग्विजय सिंह को जीतू पटवारी से कोई असहमति थी तो उसे पार्टी के अंदरूनी मंचों पर उठाना चाहिए था, न कि प्रेस कॉन्फ्रेंस कर सार्वजनिक विवाद खड़ा करना चाहिए था। उन्होंने कांग्रेस हाईकमान से दिग्विजय सिंह के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई की भी मांग की।
लेकिन इस पूरे घटनाक्रम में सवाल सिर्फ दिग्विजय सिंह से ही नहीं, निधि चतुर्वेदी से भी उठ रहे हैं।
जिस बात के लिए वह दिग्विजय सिंह को कटघरे में खड़ा कर रही हैं, क्या वही रास्ता उन्होंने स्वयं नहीं अपनाया? अगर उनका मानना है कि पार्टी के मतभेद सार्वजनिक नहीं होने चाहिए, तो फिर उन्होंने भी अपनी आपत्ति कांग्रेस के संगठनात्मक मंचों पर रखने के बजाय सोशल मीडिया पर लंबी पोस्ट लिखकर पूरे विवाद को सार्वजनिक क्यों किया?
निधि चतुर्वेदी ने अपनी पोस्ट में राहुल गांधी की उस चेतावनी का भी उल्लेख किया, जिसमें संगठन को कथित "स्लीपर सेल" से सावधान रहने की बात कही गई थी। उनके आरोपों का आशय यही माना जा रहा है कि वह दिग्विजय सिंह को पार्टी के भीतर संगठन को नुकसान पहुंचाने वाली भूमिका में देख रही हैं। ऐसे में एक बड़ा सवाल यह भी उठता है कि यदि कांग्रेस नेतृत्व को ऐसे तत्वों की जानकारी है, जैसा कि उनकी पोस्ट से संकेत मिलता है, तो फिर उन पर अब तक कोई ठोस कार्रवाई क्यों नहीं हुई?
दरअसल, यह पूरा विवाद कांग्रेस की उस पुरानी बीमारी को फिर सामने ले आया है, जिसमें नेताओं की नाराजगी और वैचारिक टकराव पहले सोशल मीडिया पर दिखाई देता है और बाद में पार्टी मंचों तक पहुंचता है। इससे विपक्ष को राजनीतिक मुद्दा मिलता है और संगठन की एकजुटता पर भी सवाल खड़े होते हैं।
कुल मिलाकर, इस प्रकरण ने एक बार फिर यह बहस छेड़ दी है कि क्या कांग्रेस में अब आंतरिक संवाद की जगह सोशल मीडिया ने ले ली है? और क्या नेताओं की व्यक्तिगत प्रतिक्रिया सार्वजनिक करने की यह परंपरा पार्टी के अनुशासन और संगठनात्मक मजबूती के लिए सबसे बड़ी चुनौती बनती जा रही है?